दोगुनी तेजी से गर्म हो रही धरती पर पिघल रही बर्फ, आ रहा बड़ा खतरा! – नासा


ग्लोबल वार्मिंग अब अपना असर दिखाने लगी है। भारत में जहां आए दिन गर्मी के नए रिकॉर्ड बन रहे हैं, अंतरिक्ष एजेंसी नासा के आंकड़े मौसम के इस गर्म मिजाज का कारण भी बता रहे हैं। इस बार का वसंत किसी हीट-वेव से कम नहीं था। मार्च में भारत में भीषण गर्मी की शुरुआत पहली बार देखी गई। अप्रैल में सैकड़ों सालों की गर्मी का रिकॉर्ड टूटा और अब मई का महीना भी गर्मी के मामले में नया रिकॉर्ड बना सकता है। इन सबका संबंध अमेरिकी अंतरिक्ष ऐजेंसी नासा के सैटेलाइट डेटा के आंकड़ों से भी सीधा जुड़ा मालूम होता है। नासा ने जो आंकड़े जारी किए हैं उनके मुताबिक, धरती की गर्म होने की दर एक साल पहले वाली दर से कहीं ज्यादा हो चुकी है। 

नासा के जारी डेटा के अनुसार पिछले 20 सालों में धरती के गर्म होने की दर तीन गुना हो चुकी है। न्यू इंडियन एक्सप्रेस में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार, नासा ने मार्च 2021 से फरवरी 2022 के बीच डेटा रिकॉर्ड किया और पाया कि धरती के वातारण में कहीं अधिक ऊर्जा बह रही है जो सुमद्रों, महाद्वीपों और वातावरण को गर्म करने के साथ धरती पर जमी बर्फ को पिघला रही है। नजीजतन समुद्र का जल स्तर बढ़ रहा है। ये आंकड़े डराने वाले हैं क्योंकि यदि समुद्र का जल स्तर अनियंत्रित गति से बढ़ा तो दुनिया में जल प्रलय आना तय है। 

वैज्ञानिकों के मुताबिक, यह डेटा बताता है कि धरती प्रति स्क्वायर मीटर पर 1.64W की दर से गर्म हो रही है। पिछले साल के मुकाबले यह दर काफी बढ़ गई है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इससे एक पहले ही धरती के गर्म होने की दर उतनी ही थी जितनी कि हरोशिमा पर लाखों एटॉमिक बम रोजाना गिराने के बाद गर्मी पैदा हो। 

इसकी स्टडी धरती की ऊर्जा में आए असंतुलन (Earth Energy Imbalance) के रूप में की जा सकती है, वह दर जिससे कि दुनिया गर्म होती जा रही है। मार्च 2021 से फरवरी 2022 के बीच का अर्थ एनर्जी इम्बेलेंस (EEI) डेटा बताता है कि धरती के सिस्टम में बहुत अधिक अतिरिक्त ऊर्जा जमा हो गई है। 

प्रकाशित रिपोर्ट में कहा गया है कि मौसम शोधकर्ता, लियोन साइमन्स के मुताबिक, 2021 के लिए नासा के CERES रेडएटिव फ्लक्स डेटा में EEI 1.52 W/m² था जो कि इस साल बढ़कर 1.64 W/m² हो गया। रिसर्चर का कहना है कि धरती को ठंडी रखने के लिए EEI को 0 W/m² के आसपास रहना चाहिए। उसके बाद इसे निगेटिव एवरेज में लाने की कोशिश की जानी चाहिए। 

फॉसिल फ्यूल के जलने की वजह से, खासकर कोयला और समुद्री जहाजों में जलने वाला बड़ी मात्रा में तेल, वातावरण में लाइट रिफ्लेक्ट करता है। इससे क्लाउड कवर बढ़ता है और रिफ्लेक्टिविटी भी बढ़ती है। जो कि अंत में, सूरज की किरणों से पैदा हुई गर्मी को धरती के वायुमंडल के अंदर ही रोक लेता है। इससे धरती लगातार गर्म होती जा रही है और धीरे धीरे जलती भट्टी में तबदील होने की राह पर है। ये आंकड़े डराने वाले हैं क्योंकि यदि समुद्र का जल स्तर अनियंत्रित गति से बढ़ा तो दुनिया में जल प्रलय आना तय है। 

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